Chapter 3
12 Nov 2022
प्रश्न 1. मानव भूगोल के मूल सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये । .
उत्तर- मानव भूगोल के मूल सिद्धान्त (Fundamental Principles of Human
Geography) मानव भूगोल में प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के अध्ययन पर प्रमुख
बल दिया जाता है। ये प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तथ्य गतिशील एवं आपस में एक-दूसरे
से सम्बन्धित होते हैं। मानव भूगोल के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु सक्रिय भौगोलिक
कारक मानव है। मानव विभिन्न प्राकृतिक कारकों से प्रभावित होता है तथा सांस्कृतिक
क्रियाओं द्वारा प्राकृतिक तत्वों को प्रभावित करता है एवं वातावरण के कारकों के
साथ समायोजन करता है। इस प्रकार विभिन्न तत्वों के आपसी सम्बन्ध एवं समायोजन के
अध्ययन हेतु मानव भूगोल के निम्नलिखित तीन मुख्य सिद्धान्त हैं
I. क्रियाशीलता का सिद्धान्त (Principle of Activity) - मनुष्य के चारों तरफ
विद्यमान भौतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के सभी तथ्य परिवर्तनशील है। प्रत्येक कारक
में प्रतिक्षण कुछ न कुछ अन्तर या परिवर्तन होता रहता है। स्वयं पृथ्वी एवं उस पर
विद्यमान सभी तत्व जड़, चेतन, प्राकृतिक, सांस्कृतिक आदि समय परिवर्तन के साथ
बदलते रहते हैं। हमारे चारों तरफ जितनी भी वस्तुएँ उपस्थित हैं वे सभी परिवर्तनशील
हैं। फ्रान्सीसी संभववादी भूगोलविद् जीन ब्रून्स के अनुसार, " प्रत्येक वस्तु या
तो बढ़ रही है या घट रही है। वास्तव में कुछ भी गतिरहित या
संजीव पास बुक्स
स्थायी नहीं है, क्योंकि भूगोल के भौतिक तथा मानवीय तथ्यों का निरन्तर
परिवर्तनशील होने की दृष्टि से उनका अध्ययन किया जाना चाहिए | " परिवर्तन प्रकृति
का नियम है - प्रकृति में प्रत्येक जीव या पदार्थ का एक जीवन काल होता है।
प्रत्येक तत्व की उत्पत्ति, विकास एवं समाप्ति होती है। इस प्रक्रिया को उस तत्व
या जीव विशेष का जीवन चक्र कहा जाता है। जीवन चक्र में भौतिक एवं सांस्कृतिक
तत्वों की उत्पत्ति बाल्यावस्था, प्रौढ़ावस्था, जीर्णावस्था एवं अन्त में समाप्ति
का चक्र प्रतिक्षण चलता रहता है। परिवर्तन सजीव और निर्जीव दोनों कारकों में
प्रतिक्षण होता रहता है। फसलों, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं आदि का जीवन समय के साथ
परिवर्तित होता रहता है। उत्पत्ति विकास समाप्ति की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है ।
इसी प्रकार कोई ऊपर उठा स्थल भाग अपरदन के विभिन्न साधनों के द्वारा कटकर नीचे
होता रहता है । पर्वत अपरदन द्वारा छोटे होते रहते हैं । हिम पिघलकर साग़रों में
जाती रहती है। स्वयं जलवायु भी परिवर्तित होती रहती है। पृथ्वी जिस पर हम रहते
हैं, स्वयं गतिशील है तथा पर्यावरण के भौतिक एवं सांस्कृतिक सभी कारक गतिशील एवं
परिवर्तनशील हैं। इस प्रकार विकास एवं क्रिया-कलापों की प्रकृति से स्पष्ट है कि
परिवर्तन प्रकृति का नियम है ।
प्रकृति में परिवर्तन के लिए उत्तरदायी कारकप्रकृति में परिवर्तन के लिए
उत्तरदायी प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
( 1 ) भौतिक या प्राकृतिक शक्तियाँ (Physical Forces) - स्थलीय रूप में स्थिर
प्रतीत होने वाला पृथ्वी तल स्थिर नहीं है। यह लगातार परिवर्तनशील हैं जिसे
आन्तरिक शक्तियाँ विषम बनाती हैं तथा बाह्य शक्तियाँ, यथा अनाच्छादन के कारक, इसे
समतल बनाने में सक्रिय रहती हैं। पृथ्वी तल पर परिवर्तन लाने वाली ये आन्तरिक एवं
बाह्य शक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से दिखलाई नहीं देतीं, अपितु इनके प्रभाव ही
परिलक्षित होते हैं। प्रमुख भौतिक या प्राकृतिक शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
(i) पृथ्वी के ग्रहीय सम्बन्ध (Planetary Relations of the Earth) - सौर मण्डल के
आठ ग्रहों में से पृथ्वी भी एक ग्रह है, जो कि अपने अक्ष के चारों तरफ घूमने के
साथ-साथ सूर्य के चारों तरफ परिक्रमा भी करती है। जिसके कारण पृथ्वी पर दिन - रात
का होना, ऋतु परिवर्तन आदि क्रियाएँ होती हैं। इन्हीं ग्रहीय सम्बन्धों के कारण
पृथ्वी पर पवन पेटी, ताप पेटियाँ, वायुदाब की पेटियाँ आदि का आविर्भाव हुआ है।
(ii) सौर शक्ति (Insolation) - पृथ्वी के धरातल एवं वायुमण्डल में होने वाले
विभिन्न परिवर्तनों का प्रमुख कारक सूर्य है। तापमान, वर्षा, गर्मी, ओस, पाला,
कुहरा, तुषार, हिमपात, वाष्पीकरण, बादलों का बनना, हवा, आँधी-तूफान आदि का चलना,
दिन-रात का बनना, ऋतु परिवर्तन, वायुदाब में भिन्नता, चक्रवात आदि क्रियाओं का
आविर्भाव सूर्य के द्वारा ही होता है। सूर्य पृथ्वी के धरातल पर होने वाले समस्त
परिवर्तनों का नियन्त्रणकर्ता एवं संचालनकर्ता माना जाता है ।
(iii) गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravitational Force) - गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण
ही वायुमण्डल का निर्माण, जल का ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होना, पृथ्वी के धरातल
के पास वायुदाब का अधिक होना आदि क्रियाएँ संचालित होती हैं। गुरुत्वाकर्षण शक्ति
के कारण ही स्थल सतह पायी जाती है। गुरुत्वाकर्षण शक्ति सौरताप के द्वारा धरातल पर
होने वाली अनियमितताओं को नियमितता में परिवर्तित कर देती है।
(iv) पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियाँ (Endogenetic Forces of Earth) - पृथ्वी की
आन्तरिक शक्तियाँ धरातलीय भाग पर दो प्रकार से प्रकट होती हैं । यथा - पर्वतों का
निर्माण, किसी भाग का ऊपर उठना या नीचे धंसना; ये क्रियाएँ धीरे-धीरे कार्य करती
हैं। इसके विपरीत दूसरी प्रकार की आन्तरिक शक्तियाँ आकस्मिक एवं अचानक प्रकट होती
हैं। इनसे अल्प अवधि में अत्यधिक परिवर्तन हो जाते हैं। ये शक्तियाँ ज्वालामुखी
एवं भूकम्प हैं।
( 2 ) जैविक शक्तियाँ (Biological Forces) - पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तु अन्य कारकों
के समान पृथ्वी के धरातलीय भाग पर अनेक प्रकार की क्रियाओं का संचालन करते हैं।
पेड़-पौधे अपक्षय एवं अपरदन की क्रिया को शिथिल कर मिट्टी का संरक्षण करते हैं।
धरातल पर पाये जाने वाले जीव-जन्तु अपने आवास के लिए मिट्टी में बिल बनाते हैं
जिसके कारण मिट्टी असंगठित होकर अपरदित होती रहती है। अतः क्षण-प्रतिक्षण
पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तु पृथ्वी के धरातलीय भाग में परिवर्तन करते रहते हैं ।
( 3 ) मानव शक्ति (Human Force) - मनुष्य स्वयं एक सक्रिय भौगोलिक कारक है जो कि
हमेशा अपनी विभिन्न क्रियाओं के द्वारा प्राकृतिक वातावरण को परिवर्तित करके
सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करता रहता है। मनुष्य अपनी बुद्धि, कौशल एवं अपनी
विचारशील क्रिया के द्वारा प्राकृतिक वातावरण में अपने अनुकूल परिवर्तन करने की
कोशिश करता रहता है। मनुष्य अपनी क्रियाशीलता के आधार पर वनों को काटकर फसल
उपजाना, ऊबड़-खाबड़ धरातल को समतल बनाना, सड़कों का निर्माण, नदियों के जल के
उपयोग के लिए बाँध, नहर बनाना, बड़े-बड़े नगरों व महानगरों का निर्माण, पुल बनाना,
सुरंग खोदना, खनन क्रिया हेतु खान खोदना आदि निर्माण कार्य करता रहता है ।
अतः मनुष्य एक सक्रिय परिवर्तनशील भौगोलिक कारक है, जो कि समय के साथ प्राकृतिक
एवं सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन करता रहता है तथा स्वयं भी परिवर्तित होता
रहता है ।
मूल्यांकन - उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि परिवर्तन या गतिशीलता एक
सार्वभौमिक सिद्धान्त है । प्रत्येक वस्तु या पदार्थ परिवर्तित होता रहता है। कोई
भी वस्तु स्थिर या शाश्वत नहीं है। प्रत्येक वस्तु का एक जीवन चक्र होता है ।
II. पार्थिव एकता या अन्तर्सम्बन्ध का सिद्धान्त (Principle of Terrestrial Unity
or Interrelationship) - संसार में विद्यमान भौतिकसांस्कृतिक, जड़-चेतन प्रत्येक
तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित और एक-दूसरे पर आश्रित हैं। प्रत्येक भौगोलिक कारक का
स्वतन्त्र एवं पृथक् अस्तित्व असंभव है ।
प्रत्येक भौगोलिक कारक दूसरे कारक से प्रभावित होता है तथा स्वयं भी अन्य तत्वों
के सम्मिलित प्रभाव के द्वारा ही क्षेत्र विशेष का वास्तविक भूदृश्य विकसित होता
है। मानव भूगोल के तथ्यों का विकास किसी-न-किसी कारक के अन्तर्सम्बन्धों का ही
परिणाम होता है। प्रत्येक कारक अन्य कारकों से प्रभावित एवं नियंत्रित होकर विकसित
होता है तथा अपने विकास के परिणामस्वरूप अन्य कारकों को भी नियंत्रित एवं प्रभावित
करता है।
भौतिक वातावरण के प्रत्येक तत्त्वों का एक-दूसरे पर आश्रित होनापृथ्वी स्वयं भी
एक इकाई के रूप में है तथा इसके विभिन्न भाग आपस में एक-दूसरे से सम्बन्धित एवं
नियंत्रित हैं। पृथ्वी के सम्पूर्ण क्षेत्र पर समान भौतिक नियम क्रियाशील हैं तथा
समस्त क्षेत्र पर समान प्रभाव डालते हैं । पृथ्वी पर पाई जाने वाली जलवायु के
विभिन्न कारक एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं तथा पृथ्वी के भू-पटल पर समान जलवायु
क्षेत्रों में एक समान जीवन एवं समान प्रकार की वनस्पति पाई जाती है।
विभिन्न भौगोलिक कारक यथा भूमि की बनावट, जलवायु तथा तापमान, आर्द्रता, वर्षा,
वायु, पाला, दाब, बादल, मिट्टी, वनस्पति, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे आदि सभी एक-दूसरे
से आपस में जुड़े हुए हैं तथा अपने जीवन निर्वाह के लिए परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर
रहते हैं तथा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
फ्रेडरिक रेट्जेल का मत- जर्मन मानव भूगोलवेत्ता फ्रेडरिक रेट्जेल ने अपनी पुस्तक
‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी' में पार्थिव एकता के सिद्धान्त पर ही सबसे अधिक बल दिया था।
उनके मतानुसार "मानव भूगोल के दृश्य पार्थिव एकता से सम्बन्धित हैं और केवल उसी के
द्वारा समझाये जा सकते हैं। प्रत्येक स्थान पर भौगोलिक दृश्य वहाँ के वातावरण से
सम्बन्धित हैं और वातावरण स्वयं भौतिक दशाओं का एक योग है।" इसी प्रकार हम्बोल्ट,
ब्लॉश, जीन ब्रून्स आदि विद्वानों ने पार्थिव एकता के सिद्धान्त के पक्ष में अपने
विचार व्यक्त किये हैं।
पक्ष में प्रमाण-पार्थिव एकता के सिद्धान्त का स्पष्टीकरण प्रकृति में मिलने वाली
निम्नलिखित दशाओं में दिखलाई देता है
- ( 1 ) पृथ्वी के मण्डल आपस में जुड़े होना- पृथ्वी पर हम स्थलमण्डल, जलमण्डल
तथा वायुमण्डल तीनों में मिलने वाली उन सामान्य दशाओं से जुड़े हैं, जिनमें जीवों
के विकास के लिए अनुकूल वातावरण मिलता है। इस सम्मिलित परिमण्डल को 'जीवमण्डल'
कहते हैं। जीवमण्डल के तत्व अगाध सागरीय क्षेत्रों से लेकर वायुमण्डल तक जुड़े हैं
। विश्वव्यापी जल चक्र इस वृहद् परितंत्र को आपस में जोड़ता है।
( 2 ) वायुमण्डल के तत्व आपस में जुड़े होना- वायुमण्डल के विभिन्न तत्व आपस में
जुड़े हुए हैं। सूर्यातप के पृथ्वी पर विषम वितरण के द्वारा ही विभिन्न वायुदाब की
पेटियाँ उत्पन्न होती हैं । पृथ्वी तल पर वायुदाब की पेटियों के द्वारा ही पवनों
की दिशा एवं गति नियंत्रित होती है। सूर्यातप से ही महासागरीय जल, स्थल
पर तथा यहाँ से नदियों द्वारा पुनः सागरों व महासागरों में पहुँचता है । इस प्रकार
सम्पूर्ण परिवेश आपस में जुड़ा हुआ है । ( 3 ) पृथ्वी की पृथक् इकाइयों में
सम्बद्धता दिखलाई देना- पृथ्वी तल पर पर्वत, पठार, झीलें तथा नदियाँ पृथक् इकाइयों
के रूप में दिखलाई देते हैं। लेकिन इनमें भी सम्बद्धता पाई जाती है । पर्वतों एवं
पठारों से नदियां निकलकर अपरदन करती हुईं पृथ्वी तल के निम्नवर्ती भागों के तलों
में वृद्धि करती हैं। कालान्तर में हिमालय जैसे गगनचुम्बी पर्वत भी अपरदित अरावली
पर्वत के समान हो जाते हैं तथा इनकी तलछट टैथीज सागर की शेष खाई को भरकर
गंगा-सिन्धु के मैदान का निर्माण कर देती है। इसी प्रकार झीलें भी एकाकी न होकर
नदियों द्वारा सागरों से जुड़ी हुई हैं। स्पष्ट है कि पर्वत, पठार, झीलें व नदियां
एकाकी न होकर पार्थिव एकता की सत्यता में सहयोगी हैं।
( 4 ) मृदा की भूमिका - भूपटल की मुख्य संघटक चट्टानों से अनाच्छादन के उपरान्त
मृदा का निर्माण होता है तथा यह मृदा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण
जीवमण्डल को जैविक आधार प्रदान करती है । इसके फलस्वरूप भू-पटल पर विभिन्न
वानस्पतिक क्षेत्र विकसित होते हैं।
( 5 ) पार्थिव एकता से मनुष्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होनाप्रकृति में मिलने वाली
पार्थिव एकता से मनुष्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जहाँ प्राकृतिक वातावरण अनुकूल
होता है वहाँ मानव समुदाय बहुलता से क्रियाशील रहता है । लेकिन विषम जलवायु अथवा
धरातल की विषम जनसंख्या पायी जाती है ।
वर्तमान समय में सूचना एवं प्रौद्योगिकी के युग में मानव ने सम्पूर्ण पृथ्वी को
एक गांव (Global village) बना दिया है। स्पष्ट है कि प्राकृतिक वातावरण के समान
सांस्कृतिक वातावरण में भी पार्थिव एकता पायी जाती है ।
मूल्यांकनउपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मानव भूगोल में विविध भौगोलिक कारकों
का अध्ययन स्वतंत्र रूप से नहीं अपितु पारस्परिक सम्बद्धता के आधार पर ही किया जा
सकता है क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी एक इकाई है जिसके विभिन्न भाग आपस में जुड़े हुए
हैं । -
III. वातावरण समायोजन का सिद्धान्त (Principle of Environmental Adjustment ) -
पृथ्वी के धरातल के विभिन्न भागों का अध्ययन भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है । मानव
भूगोल में मानव को केन्द्रीय स्थिति मानकर धरातल के परिवर्तनशील स्वरूपों का
अध्ययन एवं व्याख्या की जाती है । अतः प्राकृतिक वातावरण के विभिन्न तत्व यथा भूमि
की बनावट, जलवायु के कारक आदि मनुष्य के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण
के तत्व रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, रीति-रिवाज आदि तत्व भी मनुष्य की विभिन्न
क्रियाओं को प्रभावित करते हैं ।
सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक वातावरण के विभिन्न तत्वों के द्वारा प्रभावित होने के
साथ-साथ मनुष्य अपनी बुद्धि, कौशल एवं तकनीकी ज्ञान के आधार पर इन कारकों के साथ
अनुकूलन करता है तथा कठिन परिस्थितियों को अपने जीवन निर्वाह के
संजीव पास बुक्स
2 "D रहता है। स्वयं पृथ्वी एवं पृथ्वी पर विद्यमान सभी तत्व जड़, चेतन,
प्राकृतिक, • सांस्कृतिक आदि सभी तत्व समय परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं।
परिवर्तन की गति चाहे तीव्र हो या धीमी, उसमें समय व स्थान के अनुसार कई भेद देखने
को मिलते हैं। लेकिन यह सर्वमान्य सत्य है कि प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन होता
रहता है। यह परिवर्तन भौतिक एवं जैविक दोनों ही तत्वों में उल्लेखनीय कार्य करता
है प्रत्येक पदार्थ की क्रियाशीलता हमेशा बनी रहती है। ।
प्रतिपादक विद्वान्- क्रियाशीलता के सिद्धान्त को मानव भूगोल में स्थान देने वाले
फ्रांसीसी विद्वान् जीन ब्रून्स थे। उन्होंने यह व्यक्त किया कि भौतिक तथा
सांस्कृतिक पर्यावरण के तत्व परिवर्तन की राह में अग्रगामी हैं। प्रत्येक वस्तु
किसी न किसी रूप में बदलती रहती है। कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। ब्रून्स के
अनुसार, "हमारे चारों ओर जितनी वस्तुएँ हैं, वे सब परिवर्तनशील हैं। प्रत्येक
वस्तु या तो विकसित हो रही है या उसका ह्रास हो रहा है। कोई भी वस्तु स्थिर नहीं
है । वह गतिहीन या परिवर्तनहीन नहीं है।"
परिवर्तन प्रकृति का नियम होनाप्रकृति में प्रत्येक जीव या पदार्थ का एक जीवन काल
होता है। प्रत्येक तत्व की उत्पत्ति, विकास एवं समाप्ति होती है । इस प्रक्रिया को
उस तत्व या जीव विशेष का जीवन चक्र कहते हैं । जीवन चक्र में भौतिक एवं सांस्कृतिक
तत्वों की उत्पत्ति, बाल्यावस्था, प्रौढ़ावस्था, जीर्णावस्था एवं अन्त में समाप्ति
का चक्र क्षण प्रतिक्षण चलता रहता है। परिवर्तन सजीव एवं निर्जीव दोनों कारकों में
प्रतिक्षण होता रहता है। फसलों, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं आदि का जीवन प्रतिक्षण
बदलता रहता है । उत्पत्ति विकास समाप्ति की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है ।
इसी प्रकार कोई ऊपर उठा स्थल भाग अपरदन के विभिन्न साधनों के द्वारा कटकर नीचा
होता रहता है। पर्वत अपरदन के द्वारा निरन्तर छोटे होते रहते हैं । बर्फ पिघलकर
सागरों में जाती रहती है । स्वयं जलवायु के विभिन्न घटक तापमान, आर्द्रता, वर्षा,
हवा, वायुदाब सभी क्षण प्रतिक्षण बदलते रहते हैं। पृथ्वी जिस पर हम रहते हैं,
स्वयं गतिशील है तथा भौतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण के सभी कारक गतिशील एवं
परिवर्तनशील हैं। इस प्रकार विकास एवं क्रियाकलापों की प्रकृति से स्पष्ट है कि
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। प्रत्येक पदार्थ की क्रियाशीलता हमेशा बनी रहती है ।
प्रकृति में परिवर्तन के लिए उत्तरदायी कारक
(Factors responsible for Change in the Nature) प्रकृति में परिवर्तन के लिए
अनेक कारक उत्तरदायी हैं, जिनमें से प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
( 1 ) भौतिक या प्राकृतिक शक्तियाँ (Physical Forces) - स्थलीय रूप में स्थिर
प्रतीत होने वाला पृथ्वी तल स्थिर न होकर निरन्तर परिवर्तनशील है। इसे आन्तरिक
शक्तियाँ विषम बनाती हैं तो बाह्य शक्तियाँ (अनाच्छादन के कारक ) समतल बनाने का
कार्य करती हैं। इन शक्तियों में कुछ धीमी गति से सक्रिय रहती
हैं, जैसे- पर्वत निर्माणकारी क्रियाएँ, जबकि कुछ शक्तियाँ आकस्मिक होती हैं,
जैसेभूकम्प एवं ज्वालामुखी क्रियाएँ । धरातल पर परिवर्तन लाने वाली ये आन्तरिक एवं
बाह्य शक्तियाँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होती हैं वरन् इनके प्रभाव ही परिलक्षित
होते हैं।
प्रमुख भौतिक शक्तियाँ निम्न प्रकार से हैं
(i) सौर शक्ति (Insolation) - पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न तत्त्वों में सूर्य के
कारण प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। तापमान, वर्षा, गर्मी, ओस, कुहरा, हिमपात,
वाष्पीकरण, बादलों का बनना, आँधी-तूफान आदि का चलना, ऋतु परिवर्तन, दिन-रात का
बनना, चक्रवात आदि क्रियाओं का आविर्भाव सूर्य के द्वारा ही होता है। ये सभी
क्रियाएँ पृथ्वी पर स्थित पशु वनस्पति तथा मनुष्य के जीवन को क्रियाशील एवं
प्रभावित करती हैं । -
अतः पृथ्वी पर होने वाले सभी परिवर्तनों का मुख्य कारण सूर्य है। सूर्य की बाह्य
शक्ति के कारण ही अपरदन चक्र चलता है । हिम नदियों द्वारा भूतल के ऊँचे भागों का
अपरदन होता है तथा इनके साथ कटकर आयी तलछट के निम्नवर्ती भागों में जमा होने से भी
उनका समतलन होता है । इस प्रकार सूर्यातप के द्वारा पृथ्वी के सभी जैविक घटक
प्रभावित होते हैं । अतः सूर्य पृथ्वी के धरातल पर होने वाले समस्त परिवर्तनों का
नियंत्रणकर्ता एवं संचालनकर्ता माना जाता है।
(ii) पृथ्वी की गतियाँ (Movements of the Earth) - पृथ्वी स्थिर न होकर अपनी धुरी
पर चक्कर लगाती रहती है । इसका प्रत्येक भाग बारी-बारी से सूर्य की ओर होता है।
इसके परिणामस्वरूप दिन और रात होते हैं। सूर्य के ताप में अन्तर होने से क्रमशः
प्रात:काल, मध्याह्न, सायंकाल एवं रात्रि होती है । चूँकि पृथ्वी सूर्य के चारों
ओर परिक्रमा करती है, अतः शीत, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुएँ भी होती हैं । इस दैनिक व
वार्षिक परिवर्तन के कारण वायुमण्डल सजीव व मानव-क्रिया परिवर्तनशील रहती है ।
पृथ्वी की इन दोनों गतियों के कारण हवाओं तथा धाराओं आदि गतिशील वस्तुओं की दिशा
में भी परिवर्तन हो जाता है। पृथ्वी की यह गतियाँ जड़ और चेतन दोनों को ही
प्रभावित करती हैं।
(iii) गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravitational Force) - पृथ्वी की सतह या वायुमण्डल
में स्थित विभिन्न तत्त्वों को पृथ्वी द्वारा अपनी ओर खींचने की शक्ति ही
गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहलाती है । पृथ्वी के धरातल पर स्थित प्रत्येक वस्तु इसी
शक्ति के कारण सन्तुलित अवस्था में रहती है। इस शक्ति के कारण ही वायुमण्डल का
निर्माण, जल का ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होना, पृथ्वी के धरातल के पास वायुदाब
का अधिक होना आदि क्रियाएँ संपादित होती हैं।
अतः पृथ्वी के धरातल पर या वायुमंडल एवं जलमण्डल में रहने वाले प्रत्येक जीव
गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होते हैं। सूर्यातप द्वारा
धरातल पर उत्पन्न होने वाली अनियमितताओं को गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही नियमितता में
परिवर्तित करती है एवं यह क्रिया निरन्तर चलती रहती है ।
(iv) पृथ्वी की विवर्तनिक शक्तियाँ (Tectonic Forces) - विवर्तनिक शक्तियों
द्वारा धरातल पर दो प्रकार के परिवर्तन किये जाते हैं। प्रथम प्रकार के परिवर्तन
धीमी गति से होते हैं, जिनके प्रभाव दीर्घकाल के बाद दिखलाई देते हैं, यथा-पर्वतों
के मोड़ बनना या किसी प्रदेश का ऊपर उठना अथवा नीचे धंसना। द्वितीय प्रकार के
परिवर्तन अकस्मात् एवं तीव्र गति के साथ होते हैं, यथा-भूकम्प या ज्वालामुखी के
विस्फोट |
(2) जैविक शक्तियाँ (Biological Forces) - अन्य कारकों के समान पेड़-पौधे एवं
जीव-जन्तु भी पृथ्वी के धरातलीय भाग पर अनेक प्रकार की क्रियाओं का संचालन करते
हैं। पेड़-पौधे अपक्षय एवं अपरदन की क्रिया को शिथिल करके मिट्टी का संरक्षण करते
हैं। इनकी जड़ों के द्वारा मिट्टी में दरारें पड़ जाती हैं, जिसके कारण मिट्टी
असंगठित होकर अपक्षयित होती रहती है। पेड़-पौधों की पत्तियों के सड़ने-गलने से
मिट्टी में ह्यूमस नामक उपजाऊ तत्व का निर्माण होता रहता है । धरातल पर पाये जाने
वाले जीव-जन्तु अपने आवास के लिए मिट्टी में गुफाएँ बनाते हैं, जिसके कारण मिट्टी
असंगठित होकर अपरदित होती रहती है। अतः क्षणप्रतिक्षण पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तु
पृथ्वी के धरातलीय भाग में परिवर्तन करते रहते हैं।
( 3 ) मानव शक्ति (Human Force) - मनुष्य स्वयं एक सक्रिय भौगोलिक कारक है जो कि
हमेशा अपनी विभिन्न क्रियाओं के द्वारा प्राकृतिक वातावरण को परिवर्तित करके
सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करता है। मनुष्य अपनी बुद्धि, कौशल एवं अपनी
विचारशील क्रिया के द्वारा प्राकृतिक वातावरण में अपने अनुकूल परिवर्तन करने की
कोशिश करता है। मनुष्य अपनी क्रियाशीलता के आधार पर वनों को काट कर फसल उपजाना,
ऊबड़-खाबड़ धरातल को समतल करना, बड़े-बड़े नगरों-महानगरों, सड़कों एवं पुलों का
निर्माण करना, खनन क्रिया हेतु खान खोदना आदि निर्माण कार्य करता है ।
अतः मनुष्य एक सक्रिय परिवर्तनशील भौगोलिक कारक है जो प्रतिक्षण प्राकृतिक एवं
सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन करता रहता है तथा स्वयं भी परिवर्तित होता रहता
है। मनुष्य द्वारा निर्मित नगर, महानगर सभी की शैशवावस्था, प्रौढ़ावस्था एवं
जीर्णावस्था होती है। मानव समाज में परिवर्तन का मुख्य कारण जनसंख्या है। जनसंख्या
की वृद्धि के कारण ही आज के नगर कल के महानगर बन जाएँगे।
परिवर्तन की सार्वभौमिकता- पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न रूपों में परिवर्तन होता
रहता है । इनका संयुक्त एवं सम्मिलित प्रभाव प्रत्येक जैविक और अजैविक तत्वों पर
पड़ता है। भौतिक एवं जैविक सभी तत्वों का एक जीवन-चक्र होता है, जिसके अन्तर्गत
उनका उद्भव, विकास एवं चक्र चलता रहता है । पृथ्वी पर सबसे ऊँचे स्थल पर्वत भी
धीरे-धीरे अपरदन के द्वारा घिसकर छोटे होते रहते हैं तथा अन्त में समतल प्रायः
मैदान में परिवर्तित होते रहते हैं। स्वयं पर्वतों की भी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था,
जीर्णावस्था होती है । पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों के द्वारा
पर्वतों का निर्माण होता है। निर्माण के बाद बाह्य शक्तियाँ उनके रूप को
परिवर्तित करना शुरू कर देती हैं। अन्त में उनका स्वरूप समतल मैदान में परिवर्तित
हो जाता है।
पर्वतों के समान नदियों का भी एक जीवन चक्र होता है। धरातल पर जलवायु की दशाएँ भी
परिवर्तित होती रहती हैं। सूर्यातप के कारण तापमान, वर्षा, आर्द्रता, ओस, पाला आदि
दशाएँ प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती हैं। प्लीस्टोसीन काल में धरातल के अधिकांश
भाग पर ठण्डी जलवायु के कारण बर्फ की परत छा गयी थी। बाद में गर्म जलवायु के कारण
बर्फ के पिघलने से झीलों एवं नदियों का आविर्भाव हुआ । जलवायु के समान ही मौसमी
दशाएँ भी दिन-प्रतिदिन बदलती रहती हैं।
निष्कर्ष - उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पृथ्वी पर प्रत्येक वस्तु
परिवर्तनशील है। मानव जीवन की समस्त बातें पार्थिव वस्तुओं के समान कभी स्थिर नहीं
रहतीं। मनुष्य का उसके भौतिक और सांस्कृतिक वातावरण से कोई एक निश्चित सम्बन्ध
नहीं है। यह सम्बन्ध वातावरण में परिवर्तनों के फलस्वरूप बदलता रहता है, अतः धरातल
पर विकास व विनाश की क्रियाएँ लगातार प्रयत्नशील हैं। इस प्रकार परिवर्तन या
गतिशीलता एक सार्वभौमिक सिद्धान्त है।
प्रश्न 3. पार्थिव एकता के सिद्धान्त की सविस्तार व्याख्या कीजिये । Explain in
detail the principle of terrestrial Unity.
अथवा
मानव भूगोल में पार्थिव एकता के सिद्धान्त का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिये ।
. उत्तर- पार्थिव एकता का सिद्धान्त अथवा अन्तर्सम्बन्ध का सिद्धान्त (The
Principle of Terrestrial Unity or Principle of Inter-relationship) इस सिद्धान्त
का आशय यह है कि "विश्व के सभी भौगोलिक तथ्य, चाहे जड़ हों या चेतन, एक-दूसरे से
सम्बन्धित हैं । इन तथ्यों में कोई भी स्वतन्त्र इकाई नहीं है, इसलिए उनका पृथक्
अध्ययन करना सम्भव नहीं है । "
वे पार्थिव एकता का यह सिद्धान्त सर्वप्रथम जर्मन भूगोलशास्त्री एवं विद्वान्
रेट्जेल ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को उसके वैयक्तिक अवयवों के
रूप में न देखकर सभी अवयवों के पारस्परिक सम्बन्ध अथवा समष्टि रूप में देखा था ।
अतः इस सिद्धान्त के अन्तर्गत समस्त पृथ्वी को एकता के सूत्र में बाँधा हुआ
देखा गया है। समस्त विश्व के सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं दीर्घातिदीर्घ कारक एक-दूसरे
पर निर्भर हैं तथा वे अन्तर्सम्बन्धित हैं। पार्थिव एकता के सिद्धान्त का विवेचन
निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है
( 1 ) विभिन्नताओं के पीछे व्यापक एकता समाहित होना- पार्थिव एकता के सिद्धान्त
के अनुसार यद्यपि पृथ्वी की सतह पर सर्वत्र विभिन्नताएँ पाई जाती हैं, फिर भी एक
क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पायी जाने वाली विभिन्नताएँ प्राकृतिक एवं
सांस्कृतिक दोनों ही रूपों में सर्वत्र व्याप्त हैं। सभी प्रकार की विभिन्नताओं के
पीछे व्यापक एकता भी समाहित होती है। समस्त मानवीय क्रियाएँ इसी व्यापक एकता एवं
सार्वभौमिक एकता से प्रभावित होती हैं ।
अतः मानवीय क्रियाओं को समझने के लिए हमें एकाकी दृष्टिकोण अपनाने की तुलना में
सभी भौगोलिक पर्यावरण के तथ्यों को समान रूप से प्रभावित करने वाले मानना चाहिए।
मानव की गतिविधियों की जानकारी सार्वभौमिक एवं पार्थिव एकता द्वारा ही प्राप्त की
जा सकती है। किसी निश्चित परिस्थिति को छोड़कर पर्यावरण की विभिन्न शक्तियाँ
अलग-अलग कार्यरत नहीं होतीं और न ही वे अपना अलग-अलग प्रभाव डालती हैं। उनका
वास्तविक रूप एक-दूसरे से बंधा हुआ है । सम्पूर्ण शक्तियाँ असीमित अन्तर्सम्बन्धित
परिस्थितियों में जन्म लेती हैं और उनका अध्ययन पृथक् न होकर एक रूप में किया जाना
चाहिए।
- ( 2 ) प्राकृतिक शक्तियाँ एकरूपता के सूत्र में बंधी होना - मानव जीवन अलग-अलग
स्थानों पर भिन्न-भिन्न रूप में पाया जाता है । इसी विभिन्नता को समझना प्राकृतिक
व सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन है। सांस्कृतिक पर्यावरण कुछ सीमा तक प्राकृतिक
पर्यावरण पर निर्भर है। पर्यावरण के विभिन्न तत्व अपना स्पष्ट प्रभाव डालते हैं ।
सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियाँ अलग अवश्य हैं; लेकिन वे अन्तरसम्बन्धित भी हैं। अतः
उनका प्रभाव एकरूपता में बँधा रहता है। इसी एकरूपता को सार्वभौमिकता के सूत्र में
मानव भूगोल में अपनाया जाता है।
( 3 ) पार्थिव एकता के सिद्धान्त का महत्त्व - मानव भूगोल में पार्थिव एकता के
सिद्धान्त का अत्यन्त महत्व है। पर्यावरण के सभी तत्वों के सम्मिलित प्रभाव के
द्वारा ही मानव तथा पर्यावरण के सम्बन्धों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
विभिन्नता में एकता का सूत्रपात ही इस सिद्धान्त का मूल तथ्य है । जिस प्रकार
भारतीय जलवायु में विभिन्न पक्षों के होते हुए भी मानसूनी गुण सभी को एक सूत्र में
बाँध देता है वैसे ही धर्म, जाति, भाषा, अर्थव्यवस्था आदि में विभिन्नता होते हुए
भी सभी का मूल दृष्टिकोण एक ही है। इसलिए मानव भूगोल में मानवीय क्रियाओं को
पर्यावरण से सम्बन्धित कर समायोजन के लिए सभी तत्वों के सम्मिलित प्रभावों का
अध्ययन करना आवश्यक है।
( 4 ) प्रत्येक तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित व एक-दूसरे पर निर्भर होनासंसार में
विद्यमान प्रत्येक तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित और एक-दूसरे पर निर्भर है। प्रत्येक
भौगोलिक कारक का स्वतंत्र एवं अलग अस्तित्व असंभव है। प्रत्येक भौगोलिक कारक
एक-दूसरे कारक से प्रभावित होता है। इसी कारण किसी क्षेत्र
विशेष का वास्तविक भू-दृश्य अनेक तत्त्वों के सम्मिलित प्रभाव के द्वारा विकसित
होता है। अतः मानव भूगोल के तथ्यों का विकास किसी न किसी कारक के अन्तर्सम्बन्धों
का ही परिणाम होता है।
प्रत्येक कारक अन्य कारकों से प्रभावित एवं नियंत्रित होकर विकसित होता है एवं
स्वयं भी अपने विकास क्रम में अनेक कारकों को प्रभावित एवं नियंत्रित करता है ।
इसी कारण किसी भी भौगोलिक कारक का विश्लेषण करते समय, उन कारकों का भी अध्ययन
अवश्य किया जाता है, जो कि उसको प्रभावित करते हैं। जैसे- किसी भी प्रदेश में
निवास करने वाले मानव के रहन-सहन, जीवन, खान-पान, वेशभूषा, . सामाजिक व्यवस्था आदि
पर विभिन्न भौगोलिक दशाओं का प्रभाव पड़ता है तथा स्वयं मनुष्य भी अपने विवेक और
तकनीकी के आधार पर भौगोलिक कारकों को प्रभावित करता है ।
( 5 ) पृथ्वी के विभिन्न भाग आपस में सम्बन्धित एवं नियंत्रित होनापृथ्वी स्वयं
भी एक इकाई के रूप में है तथा इसके विभिन्न भाग आपस में एक-दूसरे से सम्बन्धित एवं
नियंत्रित हैं। पृथ्वी के सम्पूर्ण क्षेत्र पर समान भौतिक नियम क्रियाशील हैं तथा
समस्त क्षेत्र पर समान प्रभाव डालते हैं । पृथ्वी पर पाई जाने वाली जलवायु के
विभिन्न कारक एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं तथा पृथ्वी के भू-पटल पर समान जलवायु
क्षेत्रों में एक-सा जीवन तथा समान प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। विभिन्न
भौगोलिक कारक, यथा - भूमि की बनावट, तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु, बादल, मिट्टी,
वनस्पति, जीव-जन्तु आदि सभी एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित हैं एवं अपने
जीवन-निर्वाह के लिए आपस में एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं तथा एक-दूसरे को
प्रभावित करते हैं ।
उदाहरण के लिए, विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में विविध वनस्पतियों का विकास होता है;
लेकिन वनस्पति विकसित होने पर जलवायु को प्रभावित करती है; जैसेसघन एवं विस्तृत
वनस्पति क्षेत्र तापमान को प्रभावित करते हैं तथा आर्द्रता को बनाए रखते हैं। अतः
भौगोलिक वातावरण के प्रत्येक तत्व एक-दूसरे पर निर्भर, सम्बद्ध और एक-दूसरे से
संगठित होते हैं ।
( 6 ) प्रमुख विद्वानों के विचार- पार्थिव एकता के सिद्धान्त के सम्बन्ध में
विभिन्न विद्वानों के विचार निम्नलिखित हैं-
(i) फ्रेडरिक रेट्जेल- जर्मन मानव भूगोलवेत्ता फ्रेडरिक रेट्जेल ने अपनी पुस्तक
'एन्थ्रोपोज्योग्राफी' में पार्थिव एकता के सिद्धान्त पर सबसे अधिक जोर दिया था।
उनके मतानुसार, “मानव भूगोल के दृश्य पार्थिव एकता से सम्बन्धित हैं और. केवल उसी
के द्वारा समझाये जा सकते हैं। प्रत्येक स्थान पर भौगोलिक दृश्य वहाँ के वातावरण
से सम्बन्धित हैं और वातावरण स्वयं भौतिक दशाओं का एक योग है । " इस प्रकार
रेट्जेल के अनुसार भूपटल पर मानवीय क्रिया का अध्ययन भौगोलिक वातावरण के सन्दर्भ
में किया जाता है । इस अध्ययन में पृथ्वी के विभिन्न तथ्यों या अवयवों के
पारस्परिक सम्बन्धों पर बल दिया जाता है जिसमें भौगोलिक एकता के दर्शन होते हैं ।
(ii) कुमारी सैम्पुल - रेट्जेल की शिष्या कुमारी सैम्पुल ने अपनी पुस्तक में
पार्थिव एकता के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। उनके अनुसार, “मानव के
विभिन्न क्रिया-कलापों का अध्ययन वैज्ञानिक रूप में उस पृथ्वी के बिना नहीं किया
जा सकता है जिस पर वह खेती करता है, यात्राएँ करता है तथा सामुद्रिक व्यापार करता
है । "
(iii) हम्बोल्ट - हम्बोल्ट के अनुसार पृथ्वी के धरातल पर निर्मित किसी भी भूदृश्य
के निर्माण में वनस्पति का महत्वपूर्ण स्थान होता है। उन्होंने अपनी पुस्तक
'कॉसमॉस' में पृथ्वी को एक जैविक एवं अविभक्त इकाई मानते हुए लिखा है कि, "
सम्पूर्ण प्रकृति में एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक एक ही आत्मा व्याप्त है। एक ही
जीवन पत्थर, पौधों, जानवरों और यहाँ तक कि स्वयं मानव में भी प्रवेश लिए हुए पाया
जाता है। "
- (iv) विडाल-डी-ला ब्लॉश - ब्लॉश ने अपनी पुस्तक 'एजेण्ट' में लिखा है कि, “एक
देश के राजनीतिक मानचित्र का अध्ययन वहाँ के प्राकृतिक मानचित्र के साथ किया जाता
है। यह मानचित्र एक-दूसरे को स्पष्ट करते हैं और इनके पूरक दूसरे मानचित्र अथवा
रेखाचित्र होते हैं जो कि उस प्रदेश के भू-विज्ञान, जलवायु, सांख्यिकी से
सम्बन्धित होते हैं । " -
इसके अनुसार “सम्पूर्ण भौगोलिक प्रगति में प्रमुख विचार पार्थिव एकता का ही है।
पृथ्वी के सभी भाग किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं, जहाँ परिघटनाएँ निश्चित
क्रम का अनुसरण करती हैं। मानव भूगोल की परिघटनाएँ भी पार्थिव एकता से सम्बन्धित
हैं तथा केवल उसी के द्वारा इनकी व्याख्या की जा सकती है । "
(v) जीन ब्रून्स - ब्रून्स के अनुसार विभिन्न शक्तियाँ एक-दूसरे पर केवल निश्चित
दशाओं में ही कार्य नहीं करती हैं और न ही वे केवल कुछ निश्चित दृष्टान्तों में
पारस्परिक क्रिया का प्रयास करती हैं अपितु विभिन्न दशाओं के अन्तहीन
अन्तर्सम्बन्धों के कारण ये सभी शक्तियाँ आपस में घनिष्ठ रूप से बंधी हुई हैं । "
अतः पार्थिव एकता का सिद्धान्त एक शाश्वत एवं विश्वसनीय सत्य है जो कि प्राचीन
काल में विद्यमान रहा है। हमारे ब्रह्माण्ड में विद्यमान प्रत्येक तारा एकदूसरे की
आकर्षण शक्ति द्वारा सन्तुलित अवस्था में है। उसी प्रकार पृथ्वी के धरातल पर
विद्यमान प्रत्येक भौगोलिक कारक एक-दूसरे पर निर्भर एवं एक-दूसरे से नियंत्रित है।
( 7 ) अन्तर्सम्बन्ध का सिद्धान्त - प्रो. ब्रून्स द्वारा प्रतिपादित यह
सिद्धान्तं इस बात का समर्थन करता है कि वातावरण के भौतिक या मानवीय तथ्यों का
एकाकी या स्वतंत्र अध्ययन नहीं किया जा सकता है; क्योंकि प्रत्येक तत्व दूसरे तत्व
से नियंत्रित होता रहता है। नदियों का उद्गम पर्वतों से होता है, लेकिन नदियाँ
अपने साथ बहाकर लायी तलछट का जमाव भू-सन्नतियों में करती रहती हैं। जब तलछट का
जमाव अधिक हो जाता है तो उसके धंसने के कारण आन्तरिक शक्तियों के सम्पीडन के कारण
तलछट में मोड़ पड़ने लगते हैं जिसके कारण पर्वतों का निर्माण होता है । अतः नदी
एवं पर्वत दोनों का उद्भव एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित होता है।
अतः पार्थिव एकता के सिद्धान्त का सारांश यह है कि पृथ्वी के धरातल एवं वायुमंडल
में विद्यमान प्रत्येक जैविक एवं अजैविक तत्त्व, जो भौगोलिक वातावरण (सांस्कृतिक
एवं भौतिक वातावरण) के कारक हैं, परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित एवं नियंत्रित करते
हैं तथा एक-दूसरे से परस्पर अन्तर्सम्बन्धित रहते हैं। मनुष्य स्वयं भी भौतिक
वातावरण के विविध तत्वों से प्रभावित होता है तथा उन्हें अपने विवेक के आधार पर
परिवर्तित कर सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करता है। पार्थिव
एकता के सिद्धान्त के प्रमाण
(Evidences of Principle of Terrestrial Unity) पृथ्वी पर पर्यावरण के समस्त
तत्वों में एकता दिखाई देती है। कोई भी तत्व स्वतंत्र इकाई नहीं है। सभी तत्वों
में पार्थिव एकता पाई जाती है। पार्थिव एकता के सिद्धान्त के प्रमुख प्रमाण
निम्नलिखित हैं
( 1 ) मानव का सम्बन्ध - प्रकृति में मिलने वाली पार्थिव एकता से मनुष्य का
घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। जिन भागों में प्राकृतिक वातावरण अनुकूल होता है.
वहाँ मानव समुदाय बहुलता से क्रियाशील रहता है लेकिन विषम जलवायु एवं धरातल के
कारण धरातल पर विरल जनसंख्या पायी जाती है। वर्तमान सूचना एवं प्रौद्योगिकी के युग
में मानव ने सम्पूर्ण पृथ्वी को एक गांव बना दिया है। स्पष्ट है कि प्राकृतिक
वातावरण के समान सांस्कृतिक वातावरण में भी पार्थिव एकता पाई जाती है। (2)
स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल के प्रमाण-पृथ्वी पर हम स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा
वायुमण्डल तीनों में मिलने वाली उन सामान्य दशाओं से जुड़े हैं जिनमें जीवों के
विकास के लिए अनुकूल वातावरण पाया जाता है। इस सम्मिलित परिमण्डल को जीवमण्डल कहते
हैं । जीवमण्डल के तत्व अगाध सागरीय क्षेत्रों से लेकर वायुमण्डल तक जुड़े हुए
हैं। विश्वव्यापी जल चक्र इस वृहद् परितंत्र को जोड़ता है।
( 3 ) वायुमण्डल तथा धरातल का प्रमाणवायुमण्डल के विभिन्न तत्व आपस में जुड़े हुए
हैं। सूर्यातप के पृथ्वी तल पर विषम वितरण से ही विभिन्न वायुदाब की पेटियाँ
उत्पन्न होती हैं । पृथ्वी तल पर वायुदाब की पेटियों के द्वारा ही पवनों की दिशा व
वेग नियंत्रित होता है। इस व्यवस्था से हिम की मात्रा एवं वितरण भी प्रभावित होता
है । सूर्यातप से ही महासागरीय जल स्थल पर तथा यहाँ से नदियों द्वारा पुनः सागरों
व महासागरों में पहुँचता है । इस प्रकार सम्पूर्ण परिवेश जुड़ा हुआ है।
( 4 ) पर्वत, पठार, झीलें व नदियों का पार्थिव एकता में सहयोगी होनापृथ्वी तल पर
पर्वत, पठार, झीलें तथा नदियां अलग इकाइयों के रूप में दिखलाई देते हैं। लेकिन
इनमें भी सम्बद्धता है। पर्वतों व पठारों से नदियां निकलकर अपरदन करती हुई पृथ्वी
तल के निम्नवर्ती भागों के तलों में वृद्धि करती हैं। कालान्तर में हिमालय जैसे
गगनचुम्बी पर्वत भी अपरदित होकर अरावली पर्वत के समान हो जाते हैं तथा इनकी तलछट
टैथीज सागर की शेष खाई को भरकर गंगा - सिंधु के मैदान का निर्माण करती है। -
इसी प्रकार झीलें भी एकाकी न होकर नदियों द्वारा सागरों से जुड़ी हुई हैं।
उदाहरणस्वरूप- कनाडा की सस्केचवान नदी रॉकी पर्वत से निकलकर हडसन की खाड़ी में
गिरती है। इसी प्रकार उत्तरी अमेरिका की सेण्ट लारेन्स नदी पांच महान् झीलों के
समूह तथा ओण्टेरियो झीलों से होती हुई अटलाण्टिक महासागर में गिरती है तथा इरी व
ओण्टेरियो झीलों के मध्य विश्वप्रसिद्ध नियाग्रा जलप्रपात बनाती है। इस प्रकार
स्पष्ट है कि पर्वत, पठार, झीलें व नदियाँ एकाकी न होकर पार्थिव एकता में सहयोगी
हैं।
( 5 ) धरातल पर पार्थिव एकता का प्रमाण- पृथ्वी के धरातल पर अनेक सार्वभौमिक एकता
के प्रमाण मिलते हैं। यथा - प्राकृतिक वनस्पति मिट्टी से ही उत्पन्न होती है और
अन्त में समाप्त होकर पुनः मिट्टी में ही मिल जाती है । एक तरफ मृदा से पोषक
तत्वों की प्राप्ति कर वनस्पति अपना विकास करती है तथा दूसरी तरफ समाप्ति पर
वनस्पति के अवशेष मृदा में पोषक तत्वों का निर्माण करते हैं । इसी प्रकार जीव भी
प्रमुख रूप से वनस्पति पर निर्भर हैं तथा जीव भी समाप्ति पर मृदा के अंग बन जाते
हैं। इस प्रकार का क्रम धरातल पर निरन्तर चलता रहता है । प्रत्येक प्रकार के जैविक
व अजैविक पदार्थ पर्यावरण के साथ अपना सामंजस्य स्थापित करते हैं तथा पर्यावरण का
प्रभाव उसकी आकृति प्रकार तथा विकास पर पड़ता है। "
पार्थिव एकता के सिद्धान्त की आलोचना - अधिकांश मानव भूगोलवेत्ता सार्वभौमिक एकता
व अन्तर्सम्बन्धों के सिद्धान्त को अध्ययन का मूलभूत आधार मानते हैं, परन्तु कुछ
दार्शनिकों तथा विद्वानों ने पार्थिव एकता के सिद्धान्त को निराधार बतलाने की भी
कोशिश की है। उनका इस सम्बन्ध में यह मत है कि 'जीवन संघर्ष' है, यह जीव विज्ञान
का सिद्धान्त है । धरातल पर जीवों के संघर्ष के द्वारा ही वर्तमान विकास हो सका
है। एक जीव दूसरे जीव पर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए हावी हो जाता है। 'जीव,
जीव का आधार है' वाला कथन सत्य सिद्ध हो जाता है। छोटे जीव को बड़ा जीव दबाता है
तथा यह क्रम आदिकाल से चलता आ रहा है। ऐसे जीवन क्रम में अन्तर-सम्बन्ध की तरफ
लोगों को आकर्षित करना ठीक उसी प्रकार है जैसे कि युद्ध की घमासान लड़ाई के समय
दुश्मन से मित्रता की आशा रखना ।
प्रश्न 4. वातावरण समायोजन से आप क्या समझते हैं? क्षेत्र संगठन सिद्धान्त की
व्याख्या कीजिए।
उत्तर
वातावरण समायोजन का सिद्धान्त
(Principle of Environmental Adjustment)
पृथ्वी के धरातल के विभिन्न भागों का अध्ययन भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है। मानव
भूगोल में मानव की केन्द्रीय स्थिति मानकर धरातल के परिवर्तनशील स्वरूपों का
अध्ययन एवं व्याख्या की जाती है। अतः प्राकृतिक वातावरण के विभिन्न तत्व जैसे भूमि
की बनावट, जलवायु के कारक आदि एवं मनुष्य की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक
वातावरण के तत्व, जैसे- रहन-सहन, खानपान, वेशभूषा, रीति-रिवाज आदि तत्व भी मनुष्य
की विभिन्न क्रियाओं को प्रभावित करते हैं ।
सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक वातावरण के विभिन्न तत्वों के द्वारा प्रभावित होने के
साथ-साथ मनुष्य अपनी बुद्धि, कौशल एवं तकनीकी ज्ञान के आधार पर इन कारकों के साथ
अनुकूलन करता है तथा कठिन परिस्थितियों को अपने जीवननिर्वाह के अनुसार रूपान्तरित
करने की चेष्टा करता है। इस अनुकूलन एवं रूपान्तरण को ही वातावरण समायोजन कहा जाता
है।
क्षेत्र संगठन का सिद्धान्त होना- पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक,
सांस्कृतिक, आर्थिक, प्राकृतिक आदि तत्वों में विविधता पाई जाती है । अतः एक
प्रदेश से दूसरे प्रदेश या क्षेत्र में जाने पर मनुष्य को विभिन्नता का सामना करना
पड़ता है, जिसके कारण उसे अपने जीवन निर्वाह के लिए वातावरण के साथ समायोजन करना
पड़ता है। अतः इस सिद्धान्त को 'क्षेत्रीय विभेदीकरण या क्षेत्रीय संगठन का
सिद्धान्त' भी कहते हैं । -
वातावरण के तत्वों में विविधता मिलना- वातावरण के तत्वों को निम्नलिखित दो भागों
में विभाजित किया गया है
1. प्राकृतिक वातावरण के तत्व- पृथ्वी का ऊपरी भाग, जिसे भू-पर्पटी कहते हैं,
अनेक विविधताओं से युक्त है। धरातल पर पर्वत, पठार, मैदान, झील, महासागर, गहरी
खाड़ियाँ आदि विविधताएँ पाई जाती हैं। इसी प्रकार जल एवं स्थल के वितरण में भी
विषमता पाई जाती है । उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में जल की
अधिकता पाई जाती है । जलवायु के विभिन्न कारक, तापमान, वर्षा, ओस, आर्द्रता,
वायुदाब आदि का वितरण भी धरातल पर विषमतायुक्त पाया जाता है। यथा-भूमध्यरेखीय भाग
में उच्च तापमान एवं तीव्र वर्षा का प्रभाव होता है, जबकि रेगिस्तानी क्षेत्र उच्च
तापमान एवं न्यून वर्षा के कारण वनस्पतिहीन रहते हैं ।
- प्राकृतिक वातावरण में प्रादेशिक स्थिति, भूमि की बनावट, जलवायु, मिट्टियाँ,
खनिज पदार्थ, जलराशियाँ, वनस्पति, जीव-जन्तु आदि आते हैं। ये प्राकृतिक तत्त्व
मनुष्य के रहन-सहन तथा क्रियाओं को अपने अनुसार छाँटने की सीमायें निर्धारित करते
हैं और उन्हीं सीमाओं के अन्दर मनुष्य अपनी शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक क्रियाओं
का समन्वय करता है।
2. सांस्कृतिक वातावरण के तत्व - सांस्कृतिक वातावरण मूलत: मनुष्य द्वारा निर्मित
किया हुआ भू-दृश्य होता है, परन्तु धरातल पर सांस्कृतिक वातावरण
विभिन्न तत्त्वों, जैसे-रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, परिवहन, उद्योग, बैंकिंग
व्यवस्था, तकनीकी आदि में भी अत्यधिक विषमता पायी जाती है ।
इन विविधताओं एवं विषमताओं के कारण जब मानव एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र या
प्रदेश में जाता है, तो धीरे-धीरे वहाँ के वातावरण के अनुसार अपने को बदलने की
कोशिश करता है, यही 'वातावरण समायोजन' कहालता है।
वातावरण समायोजन की क्रियाएँ - वातावरण के साथ समायोजन करने के लिए मनुष्य को
निम्नलिखित दो क्रियाओं का अनुसरण करना पड़ता है1
1. अनुकूलन (Adaptation ) - मनुष्य द्वारा वातावरण के विभिन्न कारकों के प्रभाव
के अनुसार अपने आपको समायोजित करने की क्रिया को अनुकूलन कहते हैं । इस प्रक्रिया
के अन्तर्गत मनुष्य अपने आपको वातावरण के अनुसार अनुकूलित कर लेता है।
के प्रकार - यह अनुकूलन दो प्रकार का होता है । यथा
अनुकूलन (i) आन्तरिक अनुकूलन (Intrinsic Adaptation) - आन्तरिक अनुकूलन के
अन्तर्गत मनुष्य वातावरण के अनुसार बोलचाल, खान-पान, रहन-सहन आदि को बदलता है। जब
कोई मनुष्य लम्बे समय तक एक ही प्रकार के वातावरण में रहता है तो जलवायु के
विभिन्न कारकों के आधार पर उसके शारीरिक वर्ण में भी परिवर्तन हो जाता है। जैसे-
यदि कोई यूरोपीय देशों का परिवार भारत के दक्षिणी भाग या अन्य उष्ण जलवायु वाले
देशों में आकर रहता है तो उसके शरीर की त्वचा का रंग धीरेधीरे श्वेत से श्याम वर्ण
में परिवर्तित होने लगता है। यह प्रक्रिया आन्तरिक अनुकूलन ही कहलाती है।
आन्तरिक अनुकूलन मुख्यतः दो प्रकार का होता है
(a) ऐच्छिक अनुकूलन (Voluntary Adaptation ) - एक यूरोपियन परिवार जब केरल में
आकर बसता है तो उसे दिन-प्रतिदिन की आवश्यकता की वस्तुओं को खरीदने के लिए बाजार
जाना पड़ेगा। चूंकि यह यूरोपियन परिवार मलयाली भाषा नहीं जानता है, अतः उसे मलयाली
भाषा सीखनी पड़ेगी। इसके अलावा वहां की संस्कृति, रहन-सहन तथा खान-पान के बारे में
भी जानकारी प्राप्त करनी होगी। इस प्रकार यूरोपियन परिवार ने केरल में आने के बाद
मलयाली भाषा सीखी। रहन-सहन व खान-पान के नवीन तरीके सीखे । उनका यह कार्य ऐच्छिक
आन्तरिक अनुकूलन कहलाता है।
(b) अनैच्छिक आन्तरिक अनुकूलन - जब यूरोपियन परिवार लम्बे समय तक केरल में रहेगा
तो आने वाली पीढ़ियों में त्वचा में कुछ श्याम वर्ण के कण बन जायेंगे। यह परिवर्तन
‘अनैच्छिक आन्तरिक अनुकूलन' कहलाता है। इसे प्राकृतिक अनुकूलन भी कहते हैं ।
. (ii) बाह्य अनुकूलन (Extrinsic Adaptation) - एक समाज के रहनसहन एवं वेशभूषा को
दूसरे समाज के लोगों के द्वारा अपनाना 'बाह्य अनुकूलन' कहलाता है। मनुष्य दूसरे
क्षेत्र में जाकर बसने पर वहां की वेशभूषा के अनुसार वेशभूषा को भी बदल लेता है।
यह मनुष्य का बाह्य अनुकूलन कहलाता है। अपनी
वातावरण समायोजन (Environmental Adjustment )
परिवर्तन
अनुकूलन
(किसी भी जीव को अपने वातावरण के (किसी भी वातावरण में अपने अनुकूल अनुसार ढाल
लेना) परिवर्तन कर लेना)
आन्तरिक अनुकूलन बाह्य अनुकूलन प्राकृतिक वातावरण में
ऐच्छिक प्राकृतिक
परिवर्तन
( पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीदार कृषि करना, मृदा को खाद
सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन
(भाषा, संस्कृति, रहनसहन, खान-पान में बदलाव लाना)
डालकर ऊपजाऊ
सिंचाई बनाना, विकास आदि)
2. रूपान्तरण या परिवर्तन ( Modification) - प्राकृतिक वातावरण के विभिन्न कारकों
की कठोरता से बचने के लिए मनुष्य जो कृत्रिम उपाय अपनाता है, उसे ‘रूपान्तरण' कहते
हैं । यथा - यदि शीतोष्ण जलवायु के देशों में निवास करने वाले मनुष्य उष्ण जलवायु
वाले देशों में आते हैं तो वातावरण को अपने अनुकूल करने के लिए प्रशीतक
(Refrigeration), वातानुकूलित कमरों एवं गर्मी से बचने के लिए छातों का प्रयोग
करते हैं। ये प्रक्रियाएँ वातावरण का रूपान्तरण या परिवर्तन की प्रक्रिया कहलाती
हैं । अतः अनुकूलन एवं रूपान्तरण की सम्मिलित प्रक्रिया को ही वातावरण समायोजन
कहते हैं ।
विभिन्न जलवायु प्रदेशों में समायोजन की प्रक्रिया चलना- वातावरण समायोजन की
प्रक्रिया पृथ्वी के विभिन्न जलवायु प्रदेशों में चलती रहती है । यथाटुण्ड्रा
प्रदेश के निवासी कठोर शीत जलवायु से समायोजन करने के लिए शिकार करना, बर्फ के
मकान बनाना, सील मछली की चर्बी जलाकर अपने मकानों को गर्म करना आदि क्रियाएँ करते
हैं। उन भागों में कृषि भूमि की कमी पाई जाती है एवं वर्षपर्यन्त शीत जलवायु रहती
है। अतः उन क्षेत्रों के निवासी अपने-आपको वातावरण के अनुसार समायोजित कर लेते
हैं। इसी प्रकार शुष्क एवं आर्द्र क्षेत्रों में रहने वाले लोग प्रादेशिक जलवायु
के आधार पर अपने-आपको समायोजित कर लेते हैं ।
समायोजन का सिद्धान्त प्रादेशिक होना- मनुष्य द्वारा प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक
वातावरण में परिवर्तन अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए अपनी
शक्तियों तथा रुचियों के अनुसार किया जाता है। अतः धरातल के विभिन्न भागों में
निवास करने वाले मनुष्य द्वारा अपनी रुचियों एवं शक्तियों के
=
:
आधार पर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने एवं अपने-आपको वातावरण के अनुसार ढालने
की प्रक्रिया 'वातावरण समायोजन' है । प्रत्येक क्षेत्र के मनुष्य दूसरे क्षेत्र के
साथ भी समायोजन करने का प्रयास करते रहते हैं । अतः समायोजन का सिद्धान्त
प्रादेशिक है तथा समायोजन की प्रक्रिया क्षण-प्रतिक्षण चलती रहती है ।
वातावरण समायोजन में स्थानिक भिन्नता मिलनावातावरण समायोजन में सार्वभौमिक समानता
नहीं होती, अपितु स्थानिक भिन्नता पाई जाती है जिसे समायोजन का प्रादेशिक पक्ष भी
कहते हैं । स्थानिक भिन्नता के मुख्य कारण मुख्यतः धरातलीय उच्चावच एवं जलवायु के
अनुसार क्रियाशील मानव समूह हैं । यथा-टुण्ड्रा प्रदेश की शीत जलवायु में रहने
वाले लोग खाल एवं समूर के वस्त्र पहनते हैं, जबकि भूमध्यरेखीय कांगो बेसिन की
पिग्मी जनजाति के लोग अर्द्ध-नग्न अवस्था में रहते हैं ।
ऐसा विश्व स्तर पर होने के साथ-साथ प्रादेशिक स्तर पर भी पाया जाता है। जैसे-भारत
के उत्तर में स्थित जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश में ग्रीष्म काल में भी लोग
ऊनी वस्त्र पहनते हैं, जबकि इसी समय दक्षिणी भारत में भीषण गर्मी पड़ती है।
वातावरण समायोजन के दूसरे पक्ष में मानव समुदाय द्वारा वातावरण को परिवर्तित करने
सम्बन्धी क्रियाओं को शामिल किया जाता है । जैसे- शीत काल में यूरोप तथा उत्तरी
अमरीका में लोग मकानों को गर्म रखते हैं तथा उष्ण प्रदेशों में मकानों की बनावट इस
प्रकार की होती है कि उसमें धूल प्रवेश न कर सके। इस प्रकार पृथ्वी पर समायोजन में
विभिन्न स्थानिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं । भौगोलिक वातावरण से समायोजन
(Adjustment with Geographical Environment) :
पाषाण काल से मनुष्य भौतिक वातावरण में परिवर्तन लाता रहा है लेकिन यह परिवर्तन
बहुत कम हुआ है क्योंकि प्रकृति की आधारभूत क्रियाओं में बिल्कुल बदलाव नहीं आया
है। मनुष्य ने विज्ञान, तकनीकी ज्ञान और आर्थिक क्रियाओं में बहुत महत्त्वपूर्ण
परिवर्तन किये हैं। परिणामस्वरूप अपने भौतिक वातावरण के साथ समायोजन करने की
रीतियों में बहुत प्रसार हुआ है। इस प्रकार के सामंजस्यों को प्रधानतः निम्नलिखित
तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है
1. आर्थिक समायोजन (Economic Adjustment) - समाज द्वारा कार्य प्रतिमानों के रूप
में किया जाने वाला अनुकूलन आर्थिक समंजन या समायोजन कहलाता है। मनुष्य कौनसा
कार्य करता है यह उसकी इच्छाओं, विचारों और कुशलता पर निर्भर करता है । मुख्य रूप
से यह बात भौतिक वातावरण में मिलने वाली सम्पदा द्वारा प्रभावित होती है। आर्थिक
समायोजन को मुख्यतः निम्नलिखित चार श्रेणियों में बाँटा गया है-
(i) निष्कर्षण उद्योग ( Extractive Industries) - इसमें मछली पकड़ना, लकड़ी
काटना, जाल बिछाकर पशुओं को पकड़ना तथा खानें खोदना आदि शामिल किये जाते हैं। इन
कार्यों में प्रकृति से सीधे ही वस्तुएँ प्राप्त की जाती हैं। इस प्रकार मनुष्य
वस्तु की उपयोगिता पैदा करता है ।
(ii) उत्पादक उद्योग ( Genetic or Refundive Industries) - इसके अन्तर्गत मनुष्य
भूमि से उन वस्तुओं को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करने का प्रयास करता है जो
पहले से ही मौजूद हैं, यथा - कृषि, पशुपालन तथा रेशम के कीड़े पालकर उनका उत्पादन
प्राप्त किया जाता है।
(iii) निर्माण उद्योग (Fabricative Industries) - इसके अन्तर्गत खदानों अथवा कृषि
से प्राप्त वस्तुओं को पिघलाकर, साफ-सुथरा करके उनसे वस्तुएँ निर्मित की जाती हैं।
इस प्रकार के उद्योगों से स्वरूप उपयोगिता प्राप्त की जाती है।
(iv) व्यापारिक उद्योग (Commercial Industries) - इस उद्योग में यातायात,
एकत्रीकरण, विनिमय एवं अर्थ प्रबन्धन की क्रियाएँ शामिल की जाती हैं । इसके द्वारा
स्थान और समय उपयोगिता प्राप्त की जाती है। इनके साथ-साथ मनुष्य की अन्य
व्यावसायिक सेवाएँ (शिक्षा, कानून, डाक्टरी आदि), व्यक्तिगत सेवायें (घरेलू कार्य,
सफाई का कार्य आदि) भी सम्मिलित किये जाते हैं।
2. सामाजिक या सांस्कृतिक समायोजन - मानव समाज अपने भौतिक वातावरण के साथ इस
प्रकार का सामंजस्य भी स्थापित करता है । इसके अन्तर्गत जनसंख्या का घनत्व, भूमि
पर स्वामित्व, सामाजिक वर्ग, परिवार, समाज सम्बन्ध आदि प्रमुख बातों को शामिल किया
जाता है । इसी प्रकार के समायोजन में मनुष्य के व्यवहार एवं आदतें, उसका स्थायी
जमाव या घुमक्कड़ जीवन, उसके वस्त्र, भोजन, घर, आचार-विचार, धार्मिक विश्वास एवं
आस्थाएँ, कला आदि बातों का भी समावेश किया जाता है ।
3. राजनीतिक समायोजन (Political Adjustment) - मानव समाज अपने भौतिक वातावरण से
नागरिक तथा राजनीतिक समायोजन को स्थापित करता है । इस क्रिया के अन्तर्गत स्थानीय,
प्रान्तीय या राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, सैन्य
नीतियाँ तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून आदि को मानने की व्यवस्था सम्मिलित होती है।
निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मानव के ऊपर भौगोलिक वातावरण • अपनी
अमिट छाप डालता है। उसके खाने-पीने, वस्त्र तथा शिक्षा आदि अनेक बातों पर भौगोलिक
वातावरण का समुचित प्रभाव पड़ता है। मानव के चरित्र का निर्माण उस स्थान विशेष के
वातावरण के अनुकूल ही होता है। लेकिन मानव एक ओर जहाँ प्रकृति का दास है वहीं
दूसरी ओर उसने भी प्रकृति का खूब शोषण अपने विकास के लिए किया है तथा प्रकृति के
अनेक अवयवों पर विजय प्राप्त की है। मानव के दोनों रूप कर्मण्य और अकर्मण्य
साथ-साथ चलते हैं। उसकी सभी वस्तुओं और गुणों, जैसेस्वभाव, सभ्यता, संस्कृति,
कार्यक्षमता एवं रहन-सहन आदि पर वातावरण का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। अतः वातावरण
और मनुष्य एक-दूसरे से प्रगाढ़ रूप में जुड़े हुए हैं ।
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